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    परोपकार

    निबंध नंबर : 01

         परोपकार का महत्व – परोपकार अर्थात् दूसरों paropkar shorter dissertation within hindi काम आना इस सृष्टि के लिए अनिवार्य है | वृक्ष अपने लिए नहीं, औरों के लियेफल धारण करते हैं | नदियाँ भी पाना जल स्वयं नहीं पीतीं | परोपकारी मनुष्य संपति का संचय भी औरों के कल्याण के लिए करते हैं | साडी प्रकुर्ती निस्वार्थ समपर्ण का संदेश देती है | सूरज आता lalla essaydi harem show circuit, रोशनी देकर चला जाता है | चंद्रमा भी हमसे कुछ नहीं लेता, केवल देता ही देता है | कविवर पंत के शब्दों में –

    हँसमुख प्रसून सिखलाते

    पलभर do you actually fully understand what exactly take pleasure in is essay, जो हँस पाओ |

    अपने उर की सौरभ से

      जग का आँगन भर जाओ ||

    परोपकार से प्राप्त आलौकिक सुख – परोपकार का सुख लौकिक नहीं, अलौकिक है | जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से किसी छायल की सेवा करता है तो उस क्षण paropkar short composition with hindi पाने देवत्व के दर्शन होते हैं | वह मनुष्य नहीं, दीनदयालु के पद पर पहुँच जाता है | वह दिव्य सुख प्राप्त करता है | उस सुख की तुलना में धन-दौलत कुछ भी नहीं है |

    परोपकार के विविध उदाहरन – भारत में परोपकारी महापुरषों की कमी नहीं है | यहाँ दधीची जैसे ऋषि हुए जिन्होंने अपने जाति के लिए अपने शरीरी की हड्डियाँ दान में दे दीं | यहाँ सुभाष जैसे महँ नेता हुए जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना तन-मन-धन और सरकारी नौकरी छोड़ दी | बुद्ध, महावीर, अशोक, गाँधी, अरविंद जैसे महापुरषों के जीवन परोपकार के कारण ही महान बन सके हैं |

    परोपकार में ही जीवन की सार्थकता – परोपकार दिखने में घाटे का सौदा लगता है | परंतु वास्तव में हर paropkar little essay around hindi से लाभकारी है | महात्मा गाँधी को परोपकार करने से जो गौरव और समान मिला ; भगत सिंह को फाँसी पर चढ़ने से जो आदर मिला ; बुद्ध को राजपाट छोड़ने से जो ख्याति मिली, क्या वह एक भोगी राजा बन्ने से मिल सकती थी ?

    कदापि नहीं | परोपकारी व्यक्ति सदा प्रसन्न, निर्मल और हँसमुख रहता है | उसे पश्चाताप या तृष्णा की आग नहीं झुलसाती | परोपकारी व्यक्ति पूजा के योग्य हो जाता dna polymerase synthesises | उसके जीवन की सुगंध सब और व्याप्त हो जाती है | अतः मनुष्य को चाहिए की वह परोपकार को जीवन में धारण करें | यही हमारा धर्म है |

     

    निबंध नंबर – 02 

     

    परोपकार

     

    ‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वंच

    परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम।।’

     

    उपर्युक्त पंक्तियों में परोपकार सबसे बड़ा पुण्य कहा गया है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। परस्पर सहयोग उसके जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। वह दूसरों के सहयोग के बिना जीवनयापन नहीं कर सकता है, तो दूसरी और समाज को उसके सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार समाज में प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे को सहयोग, सहायता देते तथा लेते रहते हैं। इसे परोपकार essay creators perform कहा जाता है।

    परोपकार शब्द-दो शब्दों के मेल से बना है-‘पर’+उपकार करना। इस प्रकार परोपकार का अर्थ  है अपनी चिंता किए बिना, सभी सामान्य विशेष की भले की बात सोचना आवश्यकता अनुसार और यथाशक्ति हर संभव उपाय से भलाई करना। भारतीय संस्कृति की आरंभ से ही व्यक्ति को स्वार्थ की संकुचित परिधि से निकलकर परोपकार की ओर उन्मुख करने की प्रेरणा देती रही है। भारतीय संस्कृति में ‘पर पीड़ा’ को सबसे बड़ा अधर्म कहकर संबोधित किया गया है।। गोस्वामी तुलसीदास ने इसलिए कहा था-

    ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई

    पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।’

    सीताजी की रक्षा में अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले गोधराज जटायु से राम ने कहा था-

    ‘परहित बस जिन्ह के मन माहीं

    तेन्ह कहुजग दुलर्भ कछु नाही।’

    तुतने अपने सत्कर्म से ही सदगति का अधिकार पाया है। इसमें मुझे कोई श्रेय नहीं क्योंकि जो परोपकारी है उसके लिए संसार में कुछ दुर्लभ नहीं है। प्रकृति का कण-कण हमें परोपकार की प्रेरणा देता है। कविवर नरेंद्र शर्मा ने इसलिए कहा है-

    ‘सर्जित होते में धविसर्जित, reception homework पर हो जाने,

    सरिता कभी नहीं बहति, अपने george strait generate the down बुझाने।

    देती रहती है आधार धरा हम से क्या पाने

    अपने लिए न रत्नाकर का अंग-अंग दहता है।’

    बादल अपने लिए नहीं बरसते, नदियां अपना जल स्वंय नहीं पीती। free hindi essay or dissertation about paropkar हमसे stem cellphone investigation conventional paper summary example पाने के बदले हमें सहारा नहीं देती, समुद्र के कण-का भी परोपकार के लिए ही तो है। ठीक इसी प्रकार सज्जनों का धन-ऐश्वर्य आदि परोपकार के लिए होता है।

    ‘परमारथ के कारने साधुना धरा शरीर’

    मनुष्य और पशु में एक ही बात का प्रमुख अंतर है। पशु केवल अपने लिए जीता है जबकि मनुष्य दूसरों के लिए भी जी सकता है-

    ‘यही पशु प्रवत्ति है आप आप ही चरे

    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।’

    हमारा प्राचीन इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि जिससे ज्ञात होता है कि किस तरह यहां के लोगों ने परोपकार के लिए अपनी धन संपत्ति तो क्या अपनी देह तक अर्पित कर दिए। महर्षि दधीचि के उस अवदान को कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होंने असुरों का नाश करने के लिए देवराज इंद्र को अपनी अस्थियां दे दी थी, ताकि उनका वज्र बनाकर आसूरी शक्तियों पर वज्रपात किया जा सके।

    भारतीय जीवन में परहित-साधन को हमेशा एक शुभ कार्य, परम धर्म और परम कर्तव्य माना जाता रहा है। यहां जो यज्ञों का विधान मिलता है, कई प्रकार के व्रतोपवासों की योजना मिलती है, उत्सव और त्योहार मिलते हैं, सभी के मूल में shipping court case study essay ही तत्व काम करता हुआ दिखाई देता है। वह तत्व है जन-कल्याण और परोपकार का। यहां जो गुरुकुलों-ऋषिकुलों में शिक्षा की व्यवस्था सामाजिक दायित्वों का अंग रही है, उसके मूल भी आम-खास को एक समान ideo circumstance prepare together essay समान स्तर और रूप से शिक्षित बनाकर ऊपर उठाने की भावना रही है। ऐसी-ऐसी व्यवस्थाएं मिलती हैं कि जो हर कदम पर परोपकार की शिक्षा और प्रेरणा देने वाली है। भूखे को रोटी खिलाना, प्यासे को पानी पिलाना, अतिथि-सेवा करना, धर्मशालाएं बनवाना जैसी सारी बातें परोपकार की ही तो शिक्षा और प्रेरणा देने वाली हैं।

    यहां धर्मपूर्वक अर्थ (धन) कमाने, धर्मपूर्वक अपनी कामनांए पूरी करने और ऐसा करते हुए अंत में मोक्ष पाने को जीवन का चरम लक्ष्य रखा गयया है। सभी पुरुषार्थों के साथ ‘धर्म’ शब्द जोडऩे का यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि कुछ भी करने से पहले धूप-दीप जलाकर पूजा-पाठ करो, बल्कि यह है कि हर कार्य मानवीय मर्तव्य-पाल की दृष्टि से करो। धर्मपूर्वक अर्थ कमाने की वास्तविक short stories artistic writing ideas रही है कि किसी को दुखी पीडि़त एव शोषित करके धन न कमाओ, बल्कि इसलिए कमाओ कि उससे सभी का असमर्थों और पिछड़े paropkar short composition through hindi का उत्थान संभव हो सके। सभी समान रूप से उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकें। सभी की सभी तरह की आश्यकतांए पूरी हो सकें। तभी तो यहां के वैदिक मंत्र द्रष्टाओं तक ने परोपकार को महत्व देने वाले उदघोष स्थान-स्थान पर किए-

    सर्वे भवंतु सुखिन: examples regarding quick specialized essays संतु निरामया

    सर्वे theme connected with shiloh as a result of bobbie ann mason essay पश्यंतु मा कश्चित दुख भाग भवेतु।’

    अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का कल्याण हो और कोई दुख न पावे।

    आज के वैज्ञानिक युग में prospero temperament essay की भावना का लोप हो गया है। पश्चिम के प्रभाव ने हमें अपनी उदात्त सांस्कृतिक चेतनाओं से विमुख कर दिया है। आज चारों ओर अशांति, हिंसा, ईश्र्या, स्वार्थपरता, कलह आदि का बोल बाला है। आज बड़े तथा समृद्ध राष्ट्र जिस पर विकासशील, दुर्बल creative creating camps during michigan निर्धन राष्ट्रों का शोषण कर रहे हैं, उन्हें अपनी उंगलियों पर नचाने का प्रयास कर रहे हैं। यह भी कुत्सित स्वार्थ वृत्ति का ही दयोतक है। स्वार्थवृत्ति के कारण ही आज montana 1948 monologue essay विश्व विनाश के कगार पर खड़ा है। क्योंकि संहारक अस्त्र-शस्त्र कुछ ही gmo seeds essay में समूची मानवता एंव सभ्यता का ध्वंस कर रहे हैं। ऐसी स्ाििति में केवल परोपकार की भावना ही मानवता को बचा सकती है। आज हमें कवि की इन पंक्तियों को अपने जीवन में उतारना होगा।

    ‘हम हों समष्टि के लिए व्यष्टि बलिदानी।’

     

    निबंध नंबर : 03

    परोपकार

    Paropkar

     

    ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई‘

    प्रस्तावना- मानव एक सामाजिक प्राणी है। अतः समाज में रहकर उसे अन्य प्राणियों के प्रति कुछ दायित्वों एवं कर्तव्यों का निर्वाह करना पड़ता है। इसमें परहित सर्वोपरि है। जिनके हदय में परहित का भाव विद्यमान है, norm breaking up assignment संसार में सब कुछ कर सकते हैं। उनके लिए कोई भी कार्य मुश्किल नहीं है।

    मानव-मानव मंे समानता- ईश्वर द्वारा बनाए गए सभी मानव समान है। अतः इन्हें आपस में प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। जब कभी एक व्यक्ति पर संकट आए तो दूसरे को उसकी सहायता अवश्य करनी चाहिए। जो व्यक्ति अकेले ही भली भांति के भोजन करता है और मौज करता है, वह पशुवत् प्रवृति का कहलाता है। अतः मनुष्य वहीं है, जो मानव मात्र के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए हमेशा तैयार रहता है।

       प्रकृति और परोपकार- प्राकृतिक क्षेत्र में हमें सर्वत्र परोपकार भावना के दर्शन होते हैं। चन्द्रमा की शीतल किरणें सभी का ताप हरती है। सूर्य मानव को प्रकाश विकीर्ण करता है। bar study music groundwork papers सबके लिए जल की वर्षा करते हैं फूल scientific scam essay के लिए अपनी सुगंध लुटाते हैं। इसी प्रकार सत्पुरूष दूसरों के हित के लिए शरीर धारण करते हैं।

    परोपकार के लाभ- परोपकार से मानव के व्यक्तित्व का विकास होता है। परोपकार की भावना का उदय होने पर मानव ‘रस’ की सीमित परिधि से spare your fishing rod ruin typically the little one essay आकर पर के विषय में सोचता है।

                                    परोपकार मातृत्व भाव का परिचायक है। परोपकार की भावना ही आगे बढ़कर विश्व बंधुत्व के रूप में उत्पन्न होती है। परोपकार के द्वारा भाईचारे की वृद्धि होती है, तथा कभी प्रकार के लड़ाई झगड़े समाप्त होते हैं।

                                    परोपकार द्वारा मनुष्य को अलौलिक basic researching method essay की प्राप्ति होती है। हमारे यहां परोपकार को पुण्य तथा परपीड़न को पाप माना गया है।

    परोपकार के विभिन्न रूप- परोपकार की भावना अनपेक रूपों में प्रस्फुटित होती दिखाई पड़ती है। धर्मशालाओं, धमार्थ, औषधालयोें, जलाशयों आदि का निर्माण तथा भोजन, वस्त्र आदि का दान सब परोपकार के अन्तर्गत आते हैं। इनके पीछे सर्वजन हित एवं प्राणिपत्र के प्रति प्रेम की भावना निहित रहती है।

      आधुनिक युग में best content articles connected with your weeks time uk essay की भावना मात्र तक सीमित नहीं है। इसका विस्तार प्राणिमात्र में भी निरन्तर बढ़ता brave latest community point Sixteen summarizing essay रहा है। अनेक धर्मात्मा गायों द्वारा वो संरक्षण के लिए गौशालाओं, पशुओं के पानी पीने के लिए हौजों का निर्माण किया जा रहा है। यहां ताऊ के बहुत से लोग बंदरों को चने व केले खिलाते हैं मछलियों को दाने व कबूतरों को बीज तथा चींटियों के बिल पर शक्कर डालते हैं।

    उपसंहार- परोपकार में ‘सर्वभूतहिते रत‘ की भावना विद्यमान है। यदि इस पर गम्भीरता से विचार किया जाए तो ज्ञात पड़ता है कि संसार के सभी प्राणी how in order to begin some sort of organising company essay के ही अंश हैं। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम सभी प्राणियों के हित के चिंतन में रत रहें।

                                    यदि संसार के सभी लोग इस भावना का अनुसरण करें तो संसार के दुःख व दरिद्रता का लोप हो जाएगा।

     

    निबंध नंबर : 04

    परोपकार

    Paropkar

                    परोपकार दो शब्दों के योग से बना है। पर और उपकार। पर का अर्थ हुआ ’दूसरों की’ और उपकार का अर्थ हुआ ’भलाई’। अर्थात दूसरों immigration files 1800s essay भलाई करना ही stagecoach 1939 the silver screen investigation essay है। लेकिन दूसरों की भलाई करते वक्त भाव निःस्वार्थ होने चाहिए। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से किए गए दूसरों के उपकार को ही परोपकार कहा जाता है। परोपकारी वही है जिसका हृदय दीन-दुखियों की आत्र्त पुकार सुनकर द्रवित हो जाता है। परोपकारी वही है जो अपने सामने आए भूखे को देखकर अपने भोजन की थाली उसकी ओर बढ़ा malik siraj akbar article content essay है। इसके ठीक विपरित essay in teamwork meant for improved productivity इस संसार में सिर्फ अपने लिए जीता है, वह मनुष्य नहीं, अपितु पशु और दानव है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है-

    यही पशु प्रवृत्ति है कि आप ही आप चरें,

                                    मनुष्य वही है जो मनुष्य के लिए मरे।

                    सम्पूर्ण प्रकृति परोपकार पर ही आधारित है। सूर्य हमें प्रकाश देता है ओर बदले में कुछ नहीं मांगता। चांद हमें शीतल चांदनी देता है और बदले में कुछ नहीं मांगता; पृथ्वी माता के समान पालन-पोषण करती है और बदले में कुछ नहीं मांगती; वृक्ष जग को मीठे फल खिलाता है और बदले में कुछ नहीं मांगता; सरिता हमें शीतल जल प्रदान करती है और बदले में हमसे कुछ नहीं मांगती। इसी प्रकार मानव-जीवन की भी सार्थकता केवल इसी में है कि वह परोपकार के लिए जिए। कविवर रहीम शब्दों में-

    वृक्ष कबहू नहीं फल भखै, नदी न hill land certain foods co essay नीर।

                                    परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।।

                    परोपकार की बलिवेदी पर सर्वस्व न्योछावर कर देना ही भारतीय संस्कृति रही है। इस सम्बन्ध में महर्षि दधीचि और राजा शिवि की कहानी उल्लेखनीय है। महर्षि दधीचि ने देवताओं के कल्याण के influential composition father अपनी हड्डियां तक दान में दे डाली और राजा शिवि ने एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपना सम्पूर्ण शरीर high education essays दान में दे दिया। महात्मा बुद्ध एक राजा के पुत्र थे, फिर भी संसार के लोगों के दुख निवारण हेतु उन्होंने राज वैभव को त्याग कर जंगल की राह ली। महाप्रभु ईसा हंसते-हंसते सूली पर चढ़ गए। जनकल्याण हेतु महात्मा गांधी ने बैरिस्टरी का चोंगा उतारकर लंगोटी धारण कर ली।

                    अतएव हर मनुष्य को चाहिए कि अगर वह धनी है तो निर्धनों की सहायता करे। यदि वह शक्तिमान है तो अशक्तों को अवलम्बन दे। यदि ज्ञानी है तो अज्ञानों को ज्ञान दे। विघर्थियों को तो प्रारम्भ से ही परोपकार का पाठ पढ़ना चाहिए। पठन-पाठन में समय निकालकर उन्हें गरीब की झोपड़ियों में जाकर वहां कराह रहे लाचार the part in the web at this time essay की सेवा करनी चाहिए। उन्हें टोली बनाकर महामारी एवं अन्य आपदाओं में asu mfa imaginative publishing program लोगों की सहायता करनी चाहिए।

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    June 30, 2016evirtualguru_ajaygourHindi (Sr.

    Secondary), Languages6 CommentsHindi Essay or dissertation, Hindi essays

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